Muaavza By Ravindra Kant Tyagi

 

“मुआवजा”

समीक्षा क्रमांक :105

“मुआवजा”

विधा : उपन्यास

द्वारा : रवींद्र कान्त त्यागी

सौभाग्य प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित

पृष्ट :154

मूल्य : 250.00

प्रथम संस्करण : 2023


रवींद्र कान्त त्यागी जी को वरिष्ठ लेखक कहने से ज्यादा उचित प्रतीत होता है की मैं उन्हें एक ऐसे संवेदन शील व्यक्तित्व के  रूप में आप के समक्ष प्रस्तुत करूँ  जो बेतरह जमीन  से जुड़े हुए हैं तथा उनकी कहानियां  ही नहीं उनके क्रतित्व का प्रत्येक पहलू उनके संवेदनशील मन , ग्राम्य जीवन से जुड़े उनके एहसास , वहाँ की समस्याएं एवं गाँव से जुड़े उनके खट्टे मीठे अनुभवों का दस्तावेज है। उनकी कृतियाँ उनके व्यक्तित्व का परिचय स्वतः देती  है। 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी त्यागी जी के एकल कहानी संग्रह यथा “विषदंता” “प्रतिघात” “लंपट” “लकड़ी के लोग” तथा “गोश्तखोर” प्रकाशित हो चुके हैं तथा प्रत्येक नवीन पुस्तक पिछली से अधिक व्यापकता एवं लोकप्रियता प्राप्त कर चुकी है किन्तु “लंपट” एवं  “गोश्तखोर” ने तो मानो लोकप्रियता  का एक नया ही अध्याय रच दिया। “युगकथा” , “अंधा मोड” “इकरा एक संघर्ष” तथा “बेबसी” उनके साझा कहानी संग्रह प्रकाशित हुए तथा सुधि पाठकों ने उन्हें सर आँखों पर बैठाया। वहीं “पतन”, “वंशबेल में दंश” तथा “चौमासा” एवं “पिघलती मिट्टी” भी उनके अत्यंत लोकप्रिय उपन्यास हैं।

“मुआवजा” उनका नवीनतम  उपन्यास है व मेरे लिए उनके एक और साहित्यिक पक्ष को समझने का अवसर भी। प्रस्तुत उपन्यास में उन्होनें  कहानी के माध्यम से समाज की अमूमन प्रत्येक बुराई पर , इंसानी कमियों एवं दोषों पर विस्तार से बात रखी है। वह  क्षेत्रीय भाषा के सुंदर प्रयोग से भी कोई परहेज न रखते हुए कथानक में पिरोए हुए अपने श्रेष्ठ विचारों के प्रस्तुतिकरण के द्वारा कथानक को जीवंत तो रखते ही हैं साथ ही पाठक को कथाक्रम से सम्बद्ध कर लेने एवं उनकी रोचकता एवं उत्सुकता बनाए रखने  में सहज ही कामयाब हो जाते हैं ।

पुस्तक मूलतः विकास के दौर में शासन द्वारा कृषि भूमि का अधिग्रहण , उस पर देय  मुआवजा एवं अन्य संबंधित विषयों को उठती है । मुआवजा किन कारकों से प्रभावित राहत है तथा उस के कया परिणाम एवं दुष्परिणाम होते हैं इन विषयों को भी उन्होंने बखूबी बविस्तार से उठाया  है । इस मुद्दे को प्रस्तुत करने से पहले ही उन्होंने लगभग प्रत्येक  ग्रामीण समस्या का  विस्तार से विमर्श प्रस्तुत किया है जिस से मूल कथानक तक पहुचते हुए पाठक स्वयम को उस घटनाक्रम का पात्र समझने लगता है एवं मूल कथानक से जुडने में भी उसे कोई असहजता नहीं महसूस होती। 

बात नारी स्वतंत्र की हो या अवैध संबंध  की भले ही उनके पीछे उन्हें उचित साबित करने हेतु कितने भी कारण हों  अथवा बना दिए जाएं ,उन की तीक्ष्ण प्रतिक्रिया से दूर नहीं हैं तो शराब की बुराई पर बात हो या फिर दांपत्य संबंधों की , अथवा घूंघट या पर्दा प्रथा को भी  शहरी एवं ग्राम्य महिलाओं के शर्म और खुलेपन के परिप्रेक्ष्य में विषद विश्लेषण के संग  प्रस्तुत करा है।

जाती प्रथा , ऑनर किलिंग ,  शहरी संपन्नता के विरुद्ध गांव की कठिन जिंदगी की बात भी वे करते हैं , तो वहीं ग्रामीणों की विभिन्न परेशानियों पर भी उनकी नजर बनी हुई है यथा वे चर्चा करते हैं किसानों के सारे अरमान सारी उम्मीदों का मौसम पर निर्भर होना , इसी तारतम्य में किसानों की फसल पर मौसम की मार और उस पर शासकीय अनुदान या मुआवजे को लेकर भी अत्यंत तीखा व्यंग्य देखने ,में आता है ।

वे कहते हैं की “क्या पता चरणा कहीं न कहीं सरकारी मुआवजे की उम्मीद  की एक किरण हृदय में सँजोये बैठा  हो और सरकार के इस अप्रत्याशित अनुदान ने उसकी उम्मीद का टिमटिमाता आखरी चिराग भी बुझा दिया हो। तब उस ने स्वयम को ज़िंदगी के अँधेरों के हवाले कर दिया।“  

 किसानों को शुगर मिल द्वारा गन्ने का समय पर भुगतान न होना जो की पश्चिमी उत्तर प्रदेश की एक बड़ी समस्या है या फिर किसान पर सोसायटी के अथवा बेंकों के ऋण का दबाव ,  साथ ही शहर एवं ग्राम्य जीवन के संस्कारों  में अंतर तथा शहरी विकास में पीछे छूटते संस्कार पर चिंता भी दर्शाते हैं। व्यक्ति भले शहर न में रहे अथवा ग्राम्य  जीवन ही  व्यतीत करे संस्कारों  का महत्व तो सर्वोपरि ही है , शहरी संस्कृति व विकास में भी संस्कारों का उतना ही महत्वपूर्ण स्थान है ।

संस्कार समाज को संस्कृति, नैतिकता, और सामाजिक सहयोग में सम्मिलित करते हैं, जो शहरी विकास को सामूहिक रूप से सुनिश्चित करने में मदद करते हैं। इनका महत्व इसलिए भी है क्योंकि संस्कार लोगों को सही और उचित कार्रवाई और व्यवहार की दिशा में प्रेरित कर सकते हैं, जो आम जन  का समृद्धि से विकास करने  में सहायक  होता है।

वे सिर्फ अपनी बात ही नहीं रखते अपितु विचार विमर्श के रूप में इस मुद्दे के दोनों पक्षों को सामने रख कर पाठक को अपने स्वतंत्र विचार गढ़ने का अथवा उनसे सहमत या असहमत होने का भी अवसर खुला छोड़ देते हैं । वहीं शहरी विकास का अंधानुकरण करते गांव के युवा क्या खोते जा रहे हैं इस विषय को भी वे अपने विचारण में महत्वपूर्ण स्थान तो देते ही है साथ ही उनकी चिंता भी स्पष्टतः परिलक्षित होती है।

वे लिखते हैं कि  “संजय का उस दिन का व्यवहार इस बात का भी उदाहरण था की पैसे की आंच में तपकर गाँव समाज का सदियों पुराना फौलादी ढांचा पिघल कर अब बह रहा था । पैसे की गरमी से गरमा गए लोग शर्म लिहाज के लबादे को उता रकर फेंक देना चाहते थे।‘

शहरी विकास की दिशा में गांवों से शहरों की ओर माइग्रेशन का जो चलन है, उसके कई पहलू होते हैं , गांवों के युवा अपनी परंपरागत सांस्कृतिक, सामाजिक, और आर्थिक संरचना से दूर हो रहे हैं और यह उन्हें अपने मूल्यों, संस्कृति और भूमि से वंचित कर देता है, जो कई बार उनकी पहचान और संबंधों को भी प्रभावित करता है। यह उन्हें नए जीवनशैली और अनुभवों में ढाल जाने के लिए मजबूर कर सकता है, जिससे वे अपने गांवों के साथी और संस्कृति से शनैः शनैः दूरी महसूस करने लगते  हैं।

ग्रामीणों के दिल में शहरों के जीवन को लेकर आकर्षण उन्हें शहर जाने को प्रेरित करता है लेकिन आकर्षण के चलते वे सच को अनदेखा कर देते है अथवा देख ही नहीं पाते किन्तु वह सच को नहीं जानते और अपना सुखी ग्रामीण जीवन भी नर्क बना लेते है।

हालांकि यह समाजिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत पसंद का मुद्दा है। कुछ लोग शहरी जीवन में आकर्षित होते हैं और यहाँ अपना सुखी जीवन बनाना चाहते हैं एवं उस में ही सुख खोज भी लेते हैं , जबकि दूसरे गाँवों के शांतिपूर्ण जीवन को पसंद करते हैं। यह नितांत व्यक्तिगत पसंद एवं विचा रण  का मुद्दा है और हर किसी की सोच और प्राथमिकताएं अलग-अलग हो सकती हैं।

 यूं भी सुख एक मानसिक स्थिति है केवल संसाधनों से अथवा शहर जाने या न जाने से सुख प्राप्त नहीं होता , सुख खरीदा नहीं जा सकता । लोग अपने धन के निकट होने की उत्कंठा में अपनों से दूर हो रहे हैं ।मानसिक शांति नहीं है । पैसा स्वार्थ छद्म हितैषियों या चाटुकारों का जमावड़ा तो जुटा सकता है मगर सच्चा प्यार वा अपनापन नहीं दे सकता ।

वहीं बेहद मार्मिकता के साथ वे समाज के अमीर रईस परिवारों एवं गरीबों के बीच के अंतर को रखते हुए कहते हैं की “मदांध में डूबे पूरे समाज में कहीं ये चर्चा का विषय नहीं था की किसी ने उनके घरों में भी एक दीप जलाने की चिंता की या नहीं जिनके घरों के बच्चे बस तरसती सूनी निगाहों से नए अमीरों के ठाठ देखते रहे रात भर । जिनके बच्चों को भारत के सबसे बड़े पर्व  पर मिठाई का एक टुकड़ा भी नसीब नहीं होता बस सूखी रोटी ही उनका पकवान है वह भी अगर भर पेट मिल जाए तो। 

प्रथा एवं परंपराओं को जिंदा रखने की बात पर एवं विशेष तौर पर पर्दा प्रथा को लेकर उनके विचारों का खुलापन स्पष्ट दिखता है। पर्दा प्रथा आज भी विभिन्न समाजों और संस्कृतियों में व्याप्त है। यह आमतौर पर स्त्री को एक वस्तु मानते हुए उसे अन्य समाज जनों से छिपाने एवं उसकी पहचान को गोपनीय रखने के लिए होती है। कुछ लोग इसे संस्कृति और धार्मिक आधारों से समझते हैं, जबकि कुछ इसे स्त्री अधिकारों और स्वतंत्रता के प्रति विरोधी मानते हैं।

यह एक विवादास्पद विषय है, जो लोगों के धार्मिक, सांस्कृतिक, और व्यक्तिगत मान्यताओं पर आधारित होता है। यह विषय समाज में चर्चा और समझौते का विषय बनता है। यदि बात करें की पर्दा प्रथा कितनी उचित है  तो कहा जा सकता है की पर्दा प्रथा की यह व्यक्तिगत एवं  सांस्कृतिक मान्यताओं पर निर्भर करती है। कुछ लोग इसे अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ लोग इसे समाज में नारी स्वतंत्रता के प्रतीक के रूप में देखते हैं। इसमें समाज, स्थानीय संस्कृति और व्यक्तिगत आदतों का भी विचार किया जाना चाहिए।

वहीं समाज में व्याप्त एक अन्य बुराई जो आजकल बहुत देखने में आती है वह यह की विवाह के कुछ समय बाद लड़की को उसके घर वापिस भेज देना और कुछ पैसे देकर समझौता करना कितना उचित है । इस विषय को भी रवींद्र कांत जी ने कथानक के माध्यम से प्रमुखता से उठाया है वे पूछते हैं की क्या यह उस लड़की के कौमार्य का सौदा नहीं है , क्या दिए गए कुछ पैसे उसे वही मान्यता दे सकेंगे व उसका कौमार्य एवं उसके आहात मन का क्या मोल होगा।

यूं भी विवाह के कुछ समय बाद लड़की को उसके घर वापिस भेजना और उसे कुछ पैसे दे कर रिश्ता समाप्त करना , समाज में प्रचलित कुछ सांस्कृतिक अनुशासनों या पुरानी सोच का परिणाम हो सकता है, जिसे आज, आम जन  स्वीकार्य नहीं मानते हैं। यह लड़की के साथ अन्यायपूर्ण तो है ही उसके अधिकारों का भी हनन है एवं एक स्वस्थ समाज में  किसी भी व्यक्ति के अधिकारों का हनन एक अपमान ही है जो की  सही नहीं होता है, इसलिए इसे कदापि नहीं किया जाना चाहिए।

वहीं नारी स्वातंत्र्य से जुड़े विषयों को उल्लेख करते हुए वे यह प्रश्न भी विचारार्थ प्रस्तुत करते हैं की क्या स्त्री सिर्फ और सिर्फ इस लिए दबाई जा रही है क्योंकि वह आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर है । विभिन्न समाज एवं जातियों में कहीं कम   कहीं ज्यादा, समाज  में स्त्रियाँ आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होती हैं, जिससे उन्हें स्वतंत्रता के विषय पर में सीमित किया जाता है। इसका मुख्य कारण सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक धार्मिक मान्यताओं के प्रभाव में स्त्री को नियंत्रित करने और पुरुषों के अधीन रखने की प्रथा ही होना प्रतीत होती है एवं निश्चय ही इससे स्त्रियों की स्वतंत्रता , सम्मान एवं स्वाभिमान को को आहत एवं प्रभावित किया जा सकता है।

इसी संदर्भ में एक अन्य समस्या जो वे प्रमुखता से उठाते नजर आते है वह है वर्तमान में सास बहू या पति पत्नी के बीच के विवाद जिसे वे आपसी संवाद की कमी निरूपित करते हैं उनके नजरिए में सास-बहू या पति-पत्नी के बीच विवाद अक्सर सम्बन्धों में आपसी संवाद की कमी से होते हैं। यह समस्या आपसी संवाद और समझौते की कमी को दर्शाती है। समस्या को हल करने के लिए, सभी पक्षों के बीच संवाद और समझौते को मजबूत करना जरूरी है।

संवाद और समझौते के माध्यम से समस्याएं हल की जा सकती हैं। खुले मन से बातचीत करना और समस्याओं का सामना करना महत्वपूर्ण है।

विचारों का प्रस्तुतीकरण अत्यंत आकर्षक शैली एवं वाक्यांशों में प्रस्तुत किया गया है किन्तु भाषा कहीं भी क्लिष्टता की श्रेणी में नहीं पहुचती। सहज एवं सरल बनी रहती है।

मुआवजा उन हालत को भी बखूबी विस्तार से दर्शाती है जो पुश्तैनी जमीन बेच कर नए नए अमीर बने किसानों की होती है। व्यापार के तजुर्बे की कमी, घाघ बिल्डरों से मुकाबला , तो कहीं राजनेताओं के बीच से बनते बिगड़ते रास्ते , साथ ही राजनीति में घुसपैठ एवं समाज में अपनी ऊंची पकड़  बनाने के फेर में अपना सब कुछ गवा  बैठे  बुजुर्ग  एवं गलत रास्तों पर चल पड़े , जमीन बेच कर करोड़पति बन चुके  किसानों के युवा वंशजों का सर्वनाश बेहद करीब से दिखलाया है। सिर्फ सरकार द्वारा अधिग्रहण करने से जमीनो के भाव में उछाल आ जाते हैं एवम कैसे सीधे साधे किसान पैसे की आंधी दौड़ में अपना सर्वस्व गवां बैठे है और एक शांत सीधी साधी जिंदगी से विलासितापूर्ण जीवन की चाह में अपना सुख चैन संपत्ति एवं परिवार  सर्वस्व समाप्त कर बैठते हैं ,इन तमाम पक्षों को वे अपने प्रस्तुत उपन्यास के द्वारा भली भांति दर्शाने में कामयाब हुए हैं । 

शीघ्रता से होते शहरी विस्तार एवं उससे संबद्ध एक ऐसे पहलू को उजागर किया है जिस से आम जन की कम ही वाकफियत है। 

ग्रामीण जीवन के अमूमन प्रत्येक पहलू को छूती हुई एवं मुख्य विषय को विस्तार से एवं बेहद करीब से बतलाती हुई , पाठक को अपने संग संग विचरित करवाती है “मुआवजा”


शुभकामनाओं साहित,

अतुल्य  

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